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द्रोण पर्व
अध्याय ३८
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य प्रीतिसंय़ुक्तं श्रुत्वा वाक्यं तवात्मजः |  १४   क
आर्जुनिं प्रति सङ्क्रुद्धो द्रोणं दृष्ट्वा स्मय़न्निव ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति