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विराट पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
अत्र चैतन्महावीर्यं धनुः पार्थस्य गाण्डिवम् |  ६   क
एकं शतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति