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विराट पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
भारं वापि गुरुं हर्तुं कुञ्जरं वा प्रमर्दितुम् |  ३   क
मम वा वाहुविक्षेपं शत्रूनिह विजेष्यतः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति