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वन पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तः प्रत्युवाच सहस्राक्षं धनञ्जय़ः |  ४०   क
न लोकान्न पुनः कामान्न देवत्वं कुतः सुखम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति