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वन पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
चरन्तो मृगय़ां नित्यं शुद्धैर्वाणैर्मृगार्थिनः |  ४१   क
पितृदैवतविप्रेभ्यो निर्वपन्तो यथाविधि ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति