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उद्योग पर्व
अध्याय ३६
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विदुर उवाच
एवं मनुष्यमप्येकं गुणैरपि समन्वितम् |  ६२   क
शक्यं द्विषन्तो मन्यन्ते वाय़ुर्द्रुममिवैकजम् ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति