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शल्य पर्व
अध्याय ३५
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जनमेजय़ उवाच
कूपे कथं च हित्वैनं भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् |  ६   क
एतदाचक्ष्व मे व्रह्मन्यदि श्राव्यं हि मन्यसे ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति