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शल्य पर्व
अध्याय ३५
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रितस्तेषां महाराज पुरस्ताद्याति हृष्टवत् |  १९   क
एकतश्च द्वितश्चैव पृष्ठतः कालय़न्पशून् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति