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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
भवतः प्रिय़मित्येवं महद्व्यसनमीदृशम् |  ८   क
धर्मकामे प्रतीतस्य प्रतिपन्नाः स्म भारत ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति