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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
भवतश्च प्रशंसाभिर्निन्दाभिरितरस्य च |  ७२   क
कथाय़ुक्ताः परिषदः पृथग्राजन्समागताः ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति