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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमेव पृथग्दृष्ट्वा धर्मार्थौ काममेव च |  ३८   क
न धर्मपर एव स्यान्न चार्थपरमो नरः |  ३८   ख
न कामपरमो वा स्यात्सर्वान्सेवेत सर्वदा ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति