आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ३४

वैशम्पाय़न उवाच

एवं स राजा धर्मात्मा परीत्याश्रममण्डलम् |  १५   क
वसु विश्राण्य तत्सर्वं पुनराय़ान्महीपतिः ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति