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शान्ति पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
एकार्णवां महीं कृत्वा रुधिरेण परिप्लुताम् |  १५   क
जघ्नुर्दैत्यांस्तदा देवास्त्रिदिवं चैव लेभिरे ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति