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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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वैशम्पाय़न उवाच
एष एकान्तिधर्मस्ते कीर्तितो नृपसत्तम |  ५७   क
मय़ा गुरुप्रसादेन दुर्विज्ञेय़ोऽकृतात्मभिः |  ५७   ख
एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा वहवो नृप ||  ५७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति