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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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वैशम्पाय़न उवाच
इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थितः |  ४८   क
गमिष्यति क्षय़ान्ते च पुनर्नाराय़णं नृप ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति