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शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
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वैशम्पाय़न उवाच
स हि लोकय़ोनिरमृतस्य पदं; सूक्ष्मं पुराणमचलं परमम् |  १७   क
तत्साङ्ख्ययोगिभिरुदारधृतं; वुद्ध्या यतात्मभिर्विदितं सततम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति