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शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
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वैशम्पाय़न उवाच
तपसां निधिः सुमहतां महतो; यशसश्च भाजनमरिष्टकहा |  १४   क
एकान्तिनां शरणदोऽभय़दो; गतिदोऽस्तु वः स मखभागहरः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति