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शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
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जनमेजय़ उवाच
व्रह्मन्सुमहदाख्यानं भवता परिकीर्तितम् |  १   क
यच्छ्रुत्वा मुनय़ः सर्वे विस्मय़ं परमं गताः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति