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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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श्रीभगवानु उवाच
मय़ा प्रसन्नेन तवार्जुनेदं; रूपं परं दर्शितमात्मय़ोगात् |  ४७   क
तेजोमय़ं विश्वमनन्तमाद्यं; यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति