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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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अर्जुन उवाच
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो; नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद |  ३१   क
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं; न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति