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विराट पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा भूमिञ्जय़ं नाम पुत्रं मत्स्यस्य मानिनम् |  ९   क
तस्मै तत्सर्वमाचष्ट राष्ट्रस्य पशुकर्षणम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति