शान्ति पर्व  अध्याय ३२९

श्रीभगवानु उवाच

हन्त ते वर्तय़िष्यामि पुराणं पाण्डुनन्दन |  २   क
आत्मतेजोद्भवं पार्थ शृणुष्वैकमना मम ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति