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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
इदं महर्षेर्वचनं विनिश्चितं; महात्मनः पुरुषवरस्य कीर्तनम् |  १०७   क
समागमं चर्षिदिवौकसामिमं; निशम्य भक्ताः सुसुखं लभन्ते ||  १०७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति