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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
भवत्यरोगो द्युतिमान्वलरूपसमन्वितः |  १०३   क
आतुरो मुच्यते रोगाद्वद्धो मुच्येत वन्धनात् ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति