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शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
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श्रीभगवानु उवाच
ये तु तद्भाविता लोके एकान्तित्वं समास्थिताः |  ४२   क
एतदभ्यधिकं तेषां यत्ते तं प्रविशन्त्युत ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति