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अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
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नारद उवाच
मातापित्रोर्गुरुषु च सम्यग्वर्तन्ति ये सदा |  ३२   क
यथा त्वं वृष्णिशार्दूलेत्युक्त्वैवं विरराम सः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति