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अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
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नारद उवाच
नित्यं शमपरा ये च तथा ये चानसूय़काः |  २८   क
नित्यं स्वाध्याय़िनो ये च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति