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शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
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भीष्म उवाच
रविस्तु सन्तापय़ति लोकान्रश्मिभिरुल्वणैः |  ५५   क
सर्वतस्तेज आदत्ते नित्यमक्षय़मण्डलः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति