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शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
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नारद उवाच
अपराधं समाचक्ष्व पुरुषस्य स्वभावतः |  १४   क
शुक्रमन्यत्र सम्भूतं पुनरन्यत्र गच्छति ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति