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शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
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नारद उवाच
व्रह्मभूतस्य संय़ोगो नाशुभेनोपपद्यते |  ५२   क
ज्ञानेन विविधान्क्लेशानतिवृत्तस्य मोहजान् |  ५२   ख
लोके वुद्धिप्रकाशेन लोकमार्गो न रिष्यते ||  ५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति