शान्ति पर्व  अध्याय ३१३

जनक उवाच

भवांश्चोत्पन्नविज्ञानः स्थिरवुद्धिरलोलुपः |  ४७   क
व्यवसाय़ादृते व्रह्मन्नासादय़ति तत्परम् ||  ४७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति