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शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
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भीष्म उवाच
मनुष्यदेहशून्यकं भवत्यमुत्र गच्छतः |  ५३   क
प्रपश्य वुद्धिचक्षुषा प्रदृश्यते हि सर्वतः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति