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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
क्षेत्रज्ञ इति चाप्यन्यो गुणस्तत्र चतुर्दशः |  १०५   क
ममाय़मिति येनाय़ं मन्यते न च मन्यते ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति