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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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विश्वावसुरु उवाच
साङ्ख्यज्ञानं त्वय़ा व्रह्मन्नवाप्तं कृत्स्नमेव च |  ६५   क
तथैव योगज्ञानं च याज्ञवल्क्य विशेषतः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति