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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
तत्रोपनिषदं चैव परिशेषं च पार्थिव |  ३३   क
मथ्नामि मनसा तात दृष्ट्वा चान्वीक्षिकीं पराम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति