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शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
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याज्ञवल्क्य उवाच
घ्राणेन गन्धवहनं नेत्राभ्यां सूर्यमेव च |  ६   क
भ्रूभ्यां चैवाश्विनौ देवौ ललाटेन पितॄनथ ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति