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शान्ति पर्व
अध्याय ३००
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याज्ञवल्क्य उवाच
सर्वतःपाणिपादान्तः सर्वतोक्षिशिरोमुखः |  १४   क
सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति