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कर्ण पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
सर्वज्ञा यवना राजञ्शूराश्चैव विशेषतः |  ८०   क
म्लेच्छाः स्वसञ्ज्ञानिय़ता नानुक्त इतरो जनः ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति