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उद्योग पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
आमन्त्रय़े त्वा नरदेवदेव; गच्छाम्यहं पाण्डव स्वस्ति तेऽस्तु |  १   क
कच्चिन्न वाचा वृजिनं हि किं चि; दुच्चारितं मे मनसोऽभिषङ्गात् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति