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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
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अलर्क उवाच
मनसो मे वलं जातं मनो जित्वा ध्रुवो जय़ः |  ५   क
अन्यत्र वाणानस्यामि शत्रुभिः परिवारितः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति