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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
इति वृद्धो विलप्यैतत्कृपः शारद्वतो वचः |  ५०   क
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य शुशोच च मुमोह च ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति