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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
त्रासय़न्तं तथा योधान्धनुर्घोषेण पाण्डवम् |  २५   क
भूय़ एनमपश्याम सिंहं मृगगणा इव ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति