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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
येषु भारं समासज्य राज्ये मतिमकुर्महि |  १५   क
ते सन्त्यज्य तनूर्याताः शूरा व्रह्मविदां गतिम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति