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विराट पर्व
अध्याय ३
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नकुल उवाच
कुशलोऽस्म्यश्वशिक्षाय़ां तथैवाश्वचिकित्सिते |  ३   क
प्रिय़ाश्च सततं मेऽश्वाः कुरुराज यथा तव ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति