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मौसल पर्व
अध्याय ३
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वैशम्पाय़न उवाच
करालो विकटो मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः |  २   क
गृहाण्यवेक्ष्य वृष्णीनां नादृश्यत पुनः क्वचित् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति