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सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
सर्वो हि मन्यते लोक आत्मानं वुद्धिमत्तरम् |  ४   क
सर्वस्यात्मा वहुमतः सर्वात्मानं प्रशंसति ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति