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शान्ति पर्व
अध्याय २९९
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याज्ञवल्क्य उवाच
मनश्चरति राजेन्द्र चरितं सर्वमिन्द्रिय़ैः |  १५   क
न चेन्द्रिय़ाणि पश्यन्ति मन एवात्र पश्यति ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति