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वन पर्व
अध्याय २९७
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यक्ष उवाच
धन्यानामुत्तमं किं स्विद्धनानां किं स्विदुत्तमम् |  ५२   क
लाभानामुत्तमं किं स्वित्किं सुखानां तथोत्तमम् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति