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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
अगाधजन्मामरणं च राज; न्निरामय़ं वीतभय़ं शिवं च |  ३८   क
समीक्ष्य मोहं त्यज चाद्य सर्वं; ज्ञानस्य तत्त्वार्थमिदं विदित्वा ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति