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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
एतत्तत्तत्त्वमित्याहुर्निस्तत्त्वमजरामरम् |  १४   क
तत्त्वसंश्रय़णादेतत्तत्त्ववन्न च मानद |  १४   ख
पञ्चविंशतितत्त्वानि प्रवदन्ति मनीषिणः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति